गुरुवार, 24 जुलाई 2008

मेरे वतन

मेरे वतन, मेरे वतन, मेरे वतन हिंदोसतां।
अपना गगन, अपना चमन, अपना वतन हिंदोस्तां।
गाते चलें ये गीत हम, बढ़ते रहे अपने कदम।
सब साथ हैं तो क्या है ग़म, जीतेंगे हम, हममें है दम। मेरे वतन..(2)
हिंदू भी हैं, मुस्लिम भी हैं, यहां शिख़ भी ईसाई भी।
ऐसे रहें हमारा संग-संग जैसे रहे परछाई भी.. मेरे वतन..(2)
यहां मंदिरों में आरती और मस्जिदों में अज़ान है।
गीता के श्लोक यहाँ कभी, कभी आयतें कुरान है।.. मेरे वतन..(2)
त्यौहारों का ये देश है, यहां ईद और दीवाली है,
रंगत यहाँ राखी की है और रंगबिरंगी होली है।.. मेरे वतन..(2)
गंगा यमुना सरस्वती, गोदावरी और नर्मदा,
नदियां हमारे देश की, बहती रहे हरदम सदा।.. मेरे वतन..(2)
ये धरती, गांधी, नहेरु की, ये धरती है सरदार की,
जिसने दी अपनी जान वो भगत सिंह और आज़ाद की।.. मेरे वतन..(2)
कश्मीर से कन्याकुमारी तक बसा मेरा वतन,
नज़रें उठाये कोई क्या? ईस पर लुटादें जानो तन।॥ मेरे वतन..(2)


5 टिप्‍पणियां:

ज़ाकिर हुसैन ने कहा…

सब साथ हैं तो क्या है ग़म, जीतेंगे हम, हममें है दम। achhi rachna hai

राज भाटिय़ा ने कहा…

सब साथ हे तो मोत से भी लड सकते हे हम
धन्यवाद सुन्दर कविता के लिये

राज भाटिय़ा ने कहा…

तंग-जाहिद नज़र ने मुझे काफिर समझा
और काफिर ये समझता है मुसलमाँ हूँ मैं"
ये हम जैसे तमाम लोगों की पीडा है.....
अजी इतना सुन्दर लेख लिख कर टिपण्णी के लिये कोई लिंक ही नही छोडा,
भाई भौत ही बेहतरीन ढग से अपने दिल का दर्द लिखा हे, यकिन मानो बहुत से नही बहुत सारे लोग अब भी आप सब के साथ हे.
धन्यवाद

shama ने कहा…

Aapkaa likhaa har lafz achha laga. Agar mauqa mile to mere blogpe archives me jaake chand lekh( Pyarki Raah dikha Duniyaako, jo gujraat me qaumee fasadonke baad likha tha) aur kuchh kavitaye zaroor padhnekee takleef karen. mujhe badee khushee hogi. Inme teen kavitayen usfurt dhangse ek shrinkhalakee bhantee likhi gayi hain, jo mera deshke pratee poorn samarpan jatatee hain.Adnaasee aurat hun, koyee lekhika nahee. apne sukh dukh baatn yahan chalee aayee hun.
Shama

rituraj ने कहा…

bahut achchi kavita likhi hai aapne. ye itni achchi lagi ki mai to geet ki tarah padhne laga. likhte rahiye.