मंगलवार, 23 सितंबर 2008

ओ रंगों को बाँटनेवालो




ओ इन्सान को बाँटनेवालो, क़ुदरत को तो बाँट के देख़ो।
ओ भगवान को बाँटनेवालो, क़ुदरत को तो बाँट के देख़ो।
कोइ कहे रंग लाल है मेरा, कोइ कहे हरियाला मेरा।
रंग से ज़ुदा हुए तुम कैसे ओ रंगों को बाँटनेवालो? ओ इन्सान को....
आसमाँन की लाली बाँटो, पत्तों की हरियाली बाँटो,
रंग सुनहरा सुरज का और चंदा का रुपहरी बाँटो।
मेघधनुष के सात रंग को बाँट सको तो बाँट के देखो। ओ इन्सान को....
आँधी आइ धूल उठी जब, उससे पूछ लिया जो मैने।
कौन देश क्या धर्म तुम्हारा, वो बोली मेरा जग सारा।
मुझको हवा ले जाये जीधर भी में उस रूख़ पे उडके जाउं।
ना कोइ मज़हब टोके मुझको, ना कोइ सीमा रोके मुझको।
मिट्टी के इस बोल को बाँटो ओ सरहद को बाँटनेवालो... ओ इन्सान को....
नदिया अपने सूर में बहती, गाती और इठ्लाती चलदी।
मैने पूछा उस नदिया से कौन देश है चली किधर तू?
हसती गाती नदिया बोली, राह मिले मैं बहती जाउँ।
ना कोइ मज़हब टोके मुझको, ना कोइ सीमा रोके मुझको।
नदिया के पानी को बाँटो, ओ मज़हब को बाँटनेवालो। ओ इन्सान को....
फ़ुल ख़िला था इस धरती पर, महेक चली जो हवा के रुख़ पर।
मैने पूछा उस ख़ुश्बु से चली कहाँ खुश्बु फ़ैलाकर।
ख़ुश्बु बोली कर्म है मेरा, दुनिया में ख़ुशबु फ़ैलाना।
ना कोइ मज़हब टोके मुझको, ना कोइ सीमा रोके मुझको।
फ़ुलों की ख़ुश्बु को बाँटो, ओ गुलशन को बाँटनेवालो। ओ इन्सान को....
उडते पँछी से जो मैने पूछ लिया जो एक सवाल।
कौन देश क्या धर्म तुम्हारा, हँस के वो ऐसे गया टाल!
पँछी बोला सारी धरती, हमको तो लगती है अच्छी।
ना कोइ मज़हब टोके मुझको, ना कोइ सीमा रोके मुझको।
आसमाँन को बाँट के देख़ो, उँचनीच को बाँटनेवालो। ओ इन्सान को....

27 टिप्‍पणियां:

dahleez ने कहा…

अापकी अिभव्यिक्त कािबले तारीफ है।

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कविता है आप की काश सभी ऎसा सोचते,
धन्यवाद

Zakir Ali 'Rajneesh' ने कहा…

ख़ुश्बु बोली कर्म है मेरा, दुनिया में ख़ुशबु फ़ैलाना।
ना कोइ मज़हब टोके मुज़को, ना कोइ सीमा रोके मुज़को।
फ़ुलों की ख़ुश्बु को बाँटो, ओ गुलशन को बाँटनेवालो।

बहुत सुन्दर विचार हैं। इस सार्थक कविता के लिए आपको हार्दिक बधाई।

Suitur ने कहा…

अच्छी कविता है.....इस सार्थक कविता के लिए आपको हार्दिक बधाई!
और हां कमेंट बॉक्स में ये वर्ड वेरीफिकेशन का ऑप्शन हटाईए, बेहतर रहेगा!!
शुभकामनाओं के साथ...

Amit Mathur ने कहा…

रजिया आपने अच्छा कहा. मगर हम (मतलब हिंदू और मुस्लमान) हमेशा यही कहते आए हैं की 'बाँट के देखो' अरे बाँट तो दिया. ये तमाम फिरके, मज़हब, गुट, समूह सब बन चुके हैं. मेरा तो ख्याल सिर्फ़ ये है "अब मिला के देखो". क्यूंकि हम जितने बार कहेंगे "बाँट दे देखो" वो उतनी बार जवाब देंगे "लो बाँट दिया". वैसे भी आने वाली नस्ले मज़हब और फिरके की इन दीवारों को दरकिनार कर के अपनी ज़िन्दगी को एक नई परवाज़ देना चाहती हैं. आने वाले वक्तों में मज़हब और ये मज़हबी जूनून का उफान ठंडा हो जायेगा. आहिस्ता-आहिस्ता हमारे मुल्क का कल्चर बदल रहा है. हमारे त्योहारों को मनाने का ढंग लगभग एक जैसा हो रहा है. आज के वक्त ने हमारी जेनरेशन को एक नया लफ्ज़ दिया है "कूल". हम न हिंदू, न मुसलमान, न सिख, न इसाई, क्या कूल हैं हम. तो बांटने की चिंता मत कीजिये आने वाली नस्लों को इन सब बातों से ऊपर उठाई. हिंदू के बच्चो को बताइये की "जैसे हम मंदिरों में जाते हैं वैसे ही मुस्लिम मस्जिदों में जाते हैं." आने वाली नस्लें जब ये समझ जायेंगी की दोनों तरफ़ एक ही जज्बा और एक की "मस्ती" है तो वो "मज़हबी फसाद" के चंगुल से ख़ुद ही छूट जायेंगे. आपके "आमीन" कहने का शुक्रिया.

सबकी कहानी ने कहा…

bhai sahib...aaj ke wuqt mein achhi soch ki bahut zaroorat hai.agar desh ko bachana hai to humein dharam, jati se upar uthkar mulk ke bare mein sochna hoga...sirf hindustan ke liye

डॉ .अनुराग ने कहा…

एक शेर लिखा था कभी इसी बात पर ...वाही याद आ गया

क्या जाने किस ओर आयेगी धुप पहले
कल रात चाँद बटा था दो मजहबो में

श्यामल सुमन ने कहा…

रजिया राज जी,

भावाभिव्यक्ति की अच्छी कोशिश। शुभकामना। आपकी रचना के लिए कुमार विनोद की कुछ पक्तियाँ याद आ रहीं हैं-

रिश्तों का इतिहास लिखेंगे, पतझड को मधुमास लिखेंगे।
वक्त जहाँ है वहीं रुकेगा, जब हम किस्सा खास लिखेंगे।।

वो नफरत के सौदागर हैं, सौ झूठा बकवास लिखेंगे।
सारा आलम महकाए जो, खुशबू सा एहसास लिखेंगे।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

''ANYONAASTI '' ने कहा…

हर इक को ,
अपने अपने हिस्से की धूप मिली | 
साया घनेरा मिला किसी को  
तो कहीं किसी को जेठ दुपहरी ,
ज़िन्दगी बहुत खूब मिली , 
खूब मिली, क्या खूब मिली | |
मरता | |
  आज छिपता न फिरता 
ईश्वर भी इंसानों से ;  
स्वर्ग से 'हव्वा' के संग ,
जो उसे निकाला न होता |
 ज़िन्दगी बहुत खूब मिली , 
खूब मिली, क्या खूब मिली |
ज़िंदा इंसानों का हi                                                        माज़ी  होता है  ,धराशायी                                                  लोगों की  कैसे होगी परछाईं |
  युद्धरत अपने अपने कुरुक्षेत्रों में ,                                       ज़िन्दगी बहुत खूब मिली , 
खूब मिली, क्या खूब मिली |

फ़रिश्ते कहलाते ,गर मुकम्मल ,
 हम हो जाते ;
 मुकम्मल होने का संघर्ष ही,  
रश्क-ए-फ़रिश्ता   
 हमें इन्सान बनाता है |
 
 ज़िन्दगी बहुत खूब मिली , 
खूब मिली, क्या खूब मिली | |
 
----------------------------------यारो बनाओ मत मुझे मसीहा ,अंजाम मुझे मालूम है ;
हर मुल्क ओ दौरां में ,कत्ल होना ही गांधी का नसीब है ।।
हर दौर ए ईसा की तकदीर मुझे मालूम है ;
ख़ुद के कांधो पर उठाये फिरना ,अपना ही सलीब है ।।1।। 
----------------------------------

पहली नज़्म असम्पादित हैं ; कुछ लेनी मौजूं नही थी रोक लीं है | दूसरी कुछ लाईनें ' कबीरा 'अन्योंअस्ति http://anyonasti .blogspot .com पर प्रकाशित है ;जो आजकल कुछ तकनिकी वज़ुहातसे कुछ दिनों के लिए हटा ली गयी है |
आप के इरादे नेक है पर रहे बड़ी कठिन है
किसी के दर्द का एहसास
अपने दिल में भी जगाईये ;
बनिएगा मत ,मगर मसीहा
फ़क़त रहबर का फ़र्ज़ नीभाईये ||

RAJ SINH ने कहा…

SAAREE DHARATEE SAB KEE HO.
AASMAN HO MUKT GAGAN.
HAM HON PANCHEE EK DAL KE APNEE APNEE BOLEE HO.

KABHEE BANTE NA,SADA EK HON.

shyam kori 'uday' ने कहा…

फ़ुलों की ख़ुश्बु को बाँटो, ओ गुलशन को बाँटनेवालो।
... अत्यंत प्रभावशाली व प्रसंशनीय अभिव्यक्ति है।

MUFLIS ने कहा…

bahut hi paakeeza duaaoN ke sath
ek achhi nazm kahee hai....
mubarakbaad qubool farmaariN....
---MUFLIS---

manu ने कहा…

panchhi bolaa saari dharti,,,

laajawab,,,shaandar,,,,,

manu ने कहा…

panchhi bolaa saari dharti,,,,,
laajawaab;

shaandaar,,,,,

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

समसामयिक विषय पर आपने खुब कलम चलायी है, हार्दिक बधाई।

श्याम सखा 'श्याम' ने कहा…

धूप हवा पानी पर तो हक सबका है
दो दिन की जिन्दगानी पर हक सबका है

हिन्द-युग्म पर मेरी गज़ल पढने टिपण्णी लिखने हेतु आभार-
मेरे ब्लॉग आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं
http://gazalkbahane.blogspot.com/ कम से कम दो गज़ल [वज्न सहित] हर सप्ताह
http:/katha-kavita.blogspot.com दो छंद मुक्त कविता हर सप्ताह कभी-कभी लघु-कथा या कथा का छौंक भी मिलेगा
सस्नेह
श्यामसखा‘श्याम

Syed Akbar ने कहा…

काश सभी ऎसा सोचते..

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

आपकी अगली पोस्ट का इंतजार है।
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तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

Babli ने कहा…

मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

एक सार्थक उददेश्‍य को लेकर लिखी गयी कविता के लिए हार्दिक बधाई।

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खुशियों का विज्ञान-3
ऊँट का क्‍लोन

Faizullah ने कहा…

आसमाँन की लाली बाँटो, पत्तों की हरियाली बाँटो,
रंग सुनहरा सुरज का और चंदा का रुपहरी बाँटो।
मेघधनुष के सात रंग को बाँट सको तो बाँट के देखो।.......
ye hamaare bas me hota to kabke baat chuke hote...par hai nahi...

Science Bloggers Association ने कहा…

nayi rachna ki pratichha hai.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

M VERMA ने कहा…

बहुत खूब रज़िया जी --- आपकी भावनाए दिल को छु लेने वाली है.

amlendu asthana ने कहा…

Bahut der se Apki ye kavita padi. Mafi chahta hoon. Bahut umda khayal hai. Kash yaisa sab sochte

ज्योति सिंह ने कहा…

sahi kahan aapne bahut sundar rachna ओ इन्सान को बाँटनेवालो, क़ुदरत को तो बाँट के देख़ो।
ओ भगवान को बाँटनेवालो, क़ुदरत को तो बाँट के देख़ो।

Rayaz Baghakoli ने कहा…

बहुत सुंदर रचना है ...देश की एकता और अखंडता का प्रतिक है ....

Madan Saxena ने कहा…

कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने.बहुत खूब,बेह्तरीन अभिव्यक्ति